योगी आदित्यनाथ का विरोध क्यों?

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योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने पर विरोध की आवाजें क्यों उठ रही हैं? हिन्दुत्व के एजेंडे पर चलने की वजह से या कि उनके उन बयानों की वजह से जिन्हें विवादास्पद बताकर खुद उन्हें ही निशाना बनाया जाता रहा है? लगातार 5 बार से लोकसभा का चुनाव जीतते रहे योगी आदित्यनाथ पूर्वांचल के लोकप्रिय नेता रहे हैं।

खुश हैं हिन्दूवादी नेता

जो लोग अयोध्या आंदोलन से जुड़े रहे हैं वो आज सबसे ज्यादा खुश हैं। हिन्दुत्व के एजेंडे पर ईमानदार रहे नेता भी खुश हैं कि केंद्र में मोदी हैं, तो यूपी में योगी।

आजम खां का विरोध नहीं, तो योगी का क्यों?

क्या समाजवादी पार्टी अगर आजम खां को विपक्ष का नेता बना दे, तब यही लोग उनका विरोध करेंगे? क्या ऐसे लोगों ने कभी आजम खां को इससे पहले यूपी में कैबिनेट मंत्री बनने का विरोध किया था?

आजम खां को अदालत ने भी फटकारा है

जो लोग आजम खां का विरोध नहीं करते, वो किस मुंह से योगी आदित्यनाथ का विरोध कर रहे हैं? आजम खां को एक महिला से बलात्कार की घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश पर अदालत भी फटकार चुकी है। योगी आदित्यनाथ तो इस मामले में बेदाग हैं।

अयोध्या आंदोलन की आवाज ही तो बने हैं सीएम?

एक ऐसी पार्टी से जिसने राम जन्मभूमि पर मंदिर के लिए आंदोलन चलाया हो, आप अगर जन्मभूमि से जुड़े आंदोलनकारी नेता को सीएम बनाने की उम्मीद भी नहीं रख सकते तो इस पार्टी को जनादेश का मतलब क्या है?

आलोचक कह रहे हैं कि बीजेपी ने विकास के नाम पर वोट मांगा है इसलिए हिन्दुत्व का चेहरा बनाकर किसी को सीएम बनाना जनता को मूर्ख बनाना है। यही आलोचक तब कह रहे थे कि चुनाव को श्मशान-कब्रिस्तान के रंग में कर सांप्रदायिक आधार पर बीजेपी ध्रुवीकरण कर रही है। अगर आप पहले सही थे, तो उसी आधार पर आज भी योगी की ताजपोशी का नैतिक विरोध तो कर सकते हैं, लेकिन विकास के बहाने कृपया कुतर्क तो मत कीजिए।

अछूत तो नरेंद्र मोदी भी थे, अब योगी भी सही

नरेंद्र मोदी के खिलाफ क्या कम दुष्प्रचार किया गया? उनसे बड़ा सांप्रदायिक चेहरा देश में कभी किसी को बनाया गया क्या? लेकिन, आज नरेंद्र मोदी ने तमाम दुष्प्रचारों के खिलाफ अपनी छवि विकास पुरुष की बनायी है। अपने काम से देश का मन ऐसा मोहा है कि हर चुनाव में उनका डंका बज रहा है और उन्हें सांप्रदायिक कहने वाले लोगों का नैतिक विरोध कहीं दब सा गया है।

विरोध नहीं विरोध की हठधर्मिता गलत

विरोध गलत नहीं है। चाहे मोदी के विरोधी हों या योगी के, लेकिन हठधर्मिता की हद तक विरोध को ले जाना, सांप्रदायिकता या कट्टरवाद के विरोध के नाम पर समांतर कट्टरवाद पैदा करना गलत है।

मुसलमान विरोधी नहीं, गरीबों के मसीहा रहे हैं योगी


जिन लोगों ने योगी आदित्यनाथ का गरीबों के मसीहा वाली छवि को नहीं जाना है, वो पूर्वांचल चले जाएं। उनके आसपास कितने मुसलान रहते हैं, उनकी योगी के बारे में क्या राय है और यहां तक कि योगी के सेवक और आसपास के लोग भी कितने मुसलमान हैं, जरा इसकी सच्चाई भी पता कर लें। पता चल जाएगा कि योगी मुसलमानों के विरोधी नहीं रहे हैं, बल्कि हिन्दुओं के झंडाबरदार रहे हैं।

हिन्दू हित की बात करना सांप्रदायिक कैसे?

हिन्दुओं के हित की बात करना कैसे गलत हो सकता है जब मुसलमानों के हित की बात करना गलत नहीं हो। ये वही देश है जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। क्या उनके बयान को निर्विवाद रूप से मान लिया जाए? किसी को सवाल उठाने की भी इजाजत नहीं? योगी आदित्यनाथ जैसे नेता कभी इसे स्वीकार नहीं कर सकते। और, यह डंके की चोट पर है।

तीन चौथाई बहुमत का नेता हैं योगी

वैचारिक आग्रह-दुराग्रह अपनी जगह है, लेकिन योगी आदित्यनाथ को सीएम के तौर पर स्वीकार करना ही होगा। यह जनादेश है। तीन चौथाई बहुमत को आप यूं ही नकार नहीं सकते।

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