लालू के लिए बैलेट बॉक्स से निकला था जिन्न, मोदी के लिए EVM ने डाले वोट !

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अंकुर झा

लालू और मोदी में तुलना करने का मौका मयस्सर कराया है ईवीएम पर उठे सवाल ने। यूपी में तीन चौथाई बहुमत हो या उत्तराखण्ड में 46 फीसदी वोट मिलने का करिश्मा- ये काम बीजेपी के लिए ईवीएम ने किया है या मतदाताओं ने- यही वो सवाल है जो हमें अतीत में झांकने को विवश कर रहा है। लालू को याद करने के लिए मजबूर कर रहा है। वही लालू जिसने सामाजिक परिवर्तन की लहर पर सवार होकर बिहार में बदलाव का नेतृत्व किया था। तब भी वंचित तबके को राजनीति में सक्रिय देखना जिन्न निकलना कहा गया। और, आज भी विकास की लहर पर सवार मोदी के लिए जुटे व्यापक जनसमर्थन को ईवीएम में खोट का नतीजा बताया जा रहा है।

बस वक्त का पहिया घूमा है

20 बरस में वक्त का पहिया कितनी तेज़ी से घूम चुका है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कभी बैलेट बॉक्स से जिन्न निकालने वाले अब EVM से डरे हुए हैं। याद कीजिए उस दौर को जब बिहार की सियासत में लालू यादव की तूती बोलती थी। 1994 से साल 2000 के बीच का वो समय याद कीजिए, जब लालू यादव को राजनीति का रॉबिन हुड कहा जाता था।

लालू सीना ठोंककर कहते थे- बैलेट बॉक्स से जिन्न निकलेगा

तब चुनाव में छाती ठोककर लालू यादव कहा करते थे कि बैलेट बॉक्स से जिन्न निकलेगा और होता भी यही था। लालू यादव के लिए बैलेट बॉक्स से वाकई जिन्न ही निकलता था। तमाम सियासी पंडितों का ज्ञान धरा का धरा रह जाता था। लालू यादव सत्ता के शीर्ष पर ठसक के साथ पहुंचते थे। विरोधी तब भी लालू यादव पर चुनाव के दौरान बैलेट बॉक्स बदलने का आरोप लगाया करते थे।

हिन्दुस्तान की सियासत में नया बाहुबली है मोदी

अब हिंदुस्तान की राजनीति में मोदी नाम का नया बाहुबली आया है। डरे हुए विरोधी रट लगाए हुए हैं कि EVM से ‘Every Vote for Modi’ हो रहा है। तब भी बीजेपी और कांग्रेस सरीखी पार्टियां लालू दाव पर बैलेट बॉक्स बदलने का आरोप मढ़ते थे और अब वही लालू यादव कह रहे हैं कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ी कर बीजेपी के पक्ष में वोट कराया जाता है।

आरोप तब भी साबित नहीं हुए, आगे भी नहीं होंगे

बड़ी बात ये है कि न तो उस वक्त बैलेट बॉक्स बदलने का कोई आरोप लालू यादव के खिलाफ साबित हो पाया और न ही अब के दौर में बीजेपी के खिलाफ कोई पार्टी या कोई नेता ये सबूत इकट्ठा नहीं कर पाए हैं कि EVM में गड़बड़ी की जा रही है।

मायावती को चुनाव आयोग ने दिया दो टूक जवाब

बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने जब चुनाव आयोग को EVM में गड़बड़ी को लेकर चिट्ठी लिखी तो जवाब में उन्हें ऐसी वजहों का पुलिंदा दिया गया, जो बताता है कि मशीन के जरिए चुनाव कराने में गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं है।
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में बताया है

1. EVM में इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता, लिहाजा इसे ऑनलाइन हैक करना असंभव है
2. कौन सी EVM किस बूथ पर जाएगी ये आखिरी वक्त में पता चलता है, लिहाजा इसके जरिए वोट बदलना भी मुश्किल है।

3. EVM में अब वोट डालने के बाद एक पर्ची दिखती है, जिससे वोटर आश्वस्त हो सकता है कि उसने किसे वोट दिया।

4. वोटिंग शुरू होने से पहले सभी पार्टियों के पोलिंग एजेंट मॉक वोट डालकर चेक करते हैं कि वोटिंग सही हो रही है या नहीं।

5. वोटिंग मशीन में मतदान शुरू होने से पहले एजेंट के दस्तखत होते हैं, जिसे काउंटिंग के वक्त देखा जा सकता है।

हार की हताशा है EVM पर सवाल

संयोग देखिए कि इससे पहले भी कई बार EVM में गड़बड़ी की बात सामने आ चुकी है। सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा। लेकिन अब तक कहीं से ये साबित नहीं हो पाया है कि EVM को टैम्पर्ड किया जा सकता है। यानी ये तमाम आरोप हार में हताशा से ज्यादा कुछ नहीं लगता है।

फेल हुए चुनावी पंडित, ठीकरा EVM पर

अब सवाल उठता है कि अगर EVM में गड़बड़ी नहीं हुई तो कैसे चुनावी पंडितों का आकलन धरा का धरा रह गया। भाई वाह। गलती करे बुजुर्ग चुनावी पंडित, जो करोड़ों नये वोटरों को पढ़ नहीं पा रहे हैं। जाति-धर्म से ऊपर विश्लेषण ही नहीं कर पा रहे हैं। और, गलती ईवीएम की। रोहित सरदाना ने इस स्थिति पर सटीक ट्वीट किया है।

एक बार नहीं, बार-बार उम्मीदों के उलट नतीजे आते हैं। सवाल उस दौर को लेकर भी पूछा जा रहा है कि अब सवाल उठाने वाले लालू यादव के दौर में बैलेट बॉक्स को बदला नहीं जाता था, तो फिर जिन्न कैसे निकलता था?

सामाजिक क्रांति के प्रतीक बने थे लालू, विकासवादी क्रांति के प्रतीक हैं मोदी

दरअसल जब लालू यादव के लिए बैलेट बॉक्स से तब जिन्न ही निकलता था और आज भी मोदी के लिए EVM से वोट बरसता है। ये दोनों दौर एक सच्चाई बयां कर रहे हैं। सियासत में व्यापक परिवर्तन की सच्चाई। लालू यादव के दौर में सियासत में एक बड़ी सामाजिक क्रांति हुई थी। 90 के दशक में गरीब, दलित, पिछड़े वर्ग की एक बड़ी तादाद थी, जो पहली बार दबंगों की छाती पर चढ़कर वोट डाल रही थी। इस सच्चाई को कोई झटके में खारिज नहीं कर सकता कि लालू यादव की वजह से ही बड़ी संख्या में गरीब, शोषित, दलितों ने बैलेट पेपर का मुंह देखा था। पहली बार वोटिंग की थी। जाहिर है कि ऐसे लोगों के लिए लालू यादव किसी मसीहा से कम नहीं थे। ऐसे ही लोगों के वोट बैलेट बॉक्स से जिन्न बनकर निकला करते थे जो तब लालू विरोधियों के लिए समझ से परे था, पूरीा मसला पहेली था।

लालू युग बिहार में, मोदी युग देश में

अब जब से राष्ट्रीय फलक पर मोदी युग की शुरुआत हुई है, तब से लालू यादव की वही क्रांति आगे बढ़ी। मोदी ने लालू यादव की सियासत से चार कदम आगे सोचकर अपनी रणनीति बनाई। लालू यादव उसी बैलेट बॉक्स में उलझे रह गए, जबकि मोदी ने अपनी राजनीति को EVM के हिसाब से तैयार किया। लालू यादव ने जिन वोटरों को वोट डालने की हिम्मत दी, मोदी उन्हीं वोटर्स को विकास की खातिर वोट डालने के लिए मना लिया। लालू यादव ने वोट डालने की हिम्मत देकर उन्हें जात-पांत में बांधा तो उन्हीं मतदाताओं को मोदी ने जात-पांत से ऊपर उठाकर विकास की उम्मीदों में उलाझाया है।

पचाना मुश्किल है दलितों ने भी मायावती का साथ छोड़ा

सिर्फ लालू यादव ही नहीं यूपी चुनाव के बाद EVM को लेकर सबसे पहले सवाल उठाने वाली मायावती भी दलित और मुस्लिमों वोट को अपना समझती थी। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि ये दोनों वोट बीएसपी के खाते में आएंगे। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि दलित और मुस्लिम, दोनों तबके के वोटर्स बीएसपी से छिटक गए।

जाति-पाति से ऊपर उठ गए वोटर

जाहिर है कि पिछले 20 बरस में लोगों ने समझ लिया कि जाति और धर्म से ऊपर उठना होगा। विकास हर शख्स की जरूरत है। हर किसी को नौकरी चाहिए। हर किसी को भोजन चाहिए। इन्हीं वजहों से जब मुस्लिम इलाकों में  बीजेपी को वोट मिले तो तमाम विपक्षी पार्टियों में बौखलाहट हो रही है।

विपक्ष के ब्रह्मास्त्र की वैधता नहीं

EVM का हथियार बनाकर बीजेपी पर ब्रह्मास्त्र चलाया जा रहा है। मगर इस ब्रह्मास्त्र की वैधता नहीं है। मायावती, लालू यादव, केजरीवाल, अखिलेश हों या राहुल गांधी, हर कोई अपने हिसाब से सवाल उठा रहा है। लेकिन इस सच्चाई को कबूलने के लिए कोई तैयार नहीं है कि ये दौर राजनीति में परिवर्तन का है। परिवर्तन की हवा के हिसाब से जो मुड़ गया, वो नायक कहलाएगा। नीतीश कुमार इसका बड़ा उदाहरण हैं, जिन्हें बिहार में हर तबके का वोट मिला था। लालू, केजरीवाल, मायावती, अखिलेश, राहुल को भी उसी रास्ते पर चलना चाहिए।

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