3-2 से सीरीज जीत सकती थी कांग्रेस, पर 1-4 से हार गयी

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कांग्रेस से कहां हुई चूक? विधानसभा चुनाव नतीजे को कांग्रेस चाहती तो 3-2 के रूप में पेश कर सकती थी, लेकिन ये 1-4 के रूप में पलट गया। सीरीज़ जीतने के बजाए कांग्रेस सीरीज गंवा बैठी।

नेतृत्व ने खो दिया आत्मविश्वास?

आत्मविश्वास का था। कांग्रेस ने उसे खो दिया। वहीं यूपी और उत्तराखंड में मिली भारी विजय से बीजेपी का आत्मविश्वास इतना ज्यादा था कि कांग्रेस पर वो हावी नजर आयी।

दुबक गये राहुल गांधी

कांग्रेस आलाकमान चुनाव नतीजे के बाद आश्चर्यजनक रूप से प्रेस कान्फ्रेन्स करता भी नजर नहीं आया। कायदे से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को पांचों राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद नतीजों को स्वीकार करने और जनता का धन्यवाद करने की जिम्मेदार निभानी चाहिए थी, लेकिन वो अपरिपक्व नेता की तरह दुबके रहे। जब सबकुछ हाथ से निकल गया, तो आरोप लगाने के लिए सामने आ गये राहुल।


मनोबल बढ़ाने के लिए काफी थी पंजाब में मिली बड़ी जीत 

पंजाब में कांग्रेस ने 117 में से 77 सीटें हासिल की। यानी दो तिहाई सीटें कांग्रेस ने अकेले जीत ली। वोट प्रतिशत के हिसाब से देखें तो कांग्रेस को यहां 38.5 फीसदी वोट मिला। वहीं अकाली-बीजेपी गठबंधन को 30.5 फीसदी। यूपी में बीजेपी को 39.7 फीसदी वोट शेयर मिले, जबकि उत्तराखण्ड में उसे 46.5फीसदी वोट शेयर मिले। कांग्रेस की जीत हर मायने में बड़ी उपलब्धि थी। कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल उठाने के लिए इस जीत को उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती थी, लेकिन खुद आलाकमान का मनोबल गिरा हुआ था।

गोवा में कांग्रेस ने मौका गंवा दिया

गिरे मनोबल का ही नतीजा था कि गोवा में 17 सीट लेकर सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस अदद 4 विधायकों के समर्थन का इंतजाम नहीं कर पायी। यहां तक कि पार्टी विधायक दल का नेता चुनने में भी देरी हो गयी। ऐसा तब हुआ जबकि चुनाव वाले दिन ही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने चारों राज्यों में सरकार बनाने का एलान कर दिया था। इसके बावजूद कांग्रेस सबकुछ बुजुर्ग नेता दिग्विजय सिंह के हवाले कर निश्चिंत बैठी रह गयी। गोवा में जनादेश के खिलाफ रहते हुए भी बीजेपी ने सहयोगी दल ढूंढ़ लिए और सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। 13 सीटें जीतकर भी बीजेपी ने 8 अतिरिक्त समर्थन का दावा पत्र राज्यपाल को सौंप दिया। वहां सरकार बनने तक बीजेपी के तमाम बड़े नेता जमे रहे। नये मुख्यमंत्री का उत्साह बढ़ाने खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी मौजूद दिखे।

सुप्रीम कोर्ट से भी मिली लताड़

खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे की तर्ज पर कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, वहां भी उन्हें अप्रिय और उलाहना भरे सवालों का सामना करना पड़ा और गोवा की सत्ता देखते-देखते हाथ से निकल गयी। मनोहर पर्रिकर ने मुख्यमंत्री पद सम्भाल लिया। अब फ्लोर टेस्ट देने की चुनौती आसानी से पास कर लेगी, ऐसा इसलिए माना जा रहा है कि उस कांग्रेस से क्या उम्मीद की जाए जो हाथ आयी सरकार को भी सम्भालने का जज्बा नहीं दिखा सकी।

मणिपुर भी हाथ से निकला

मणिपुर में कांग्रेस ने गोवा जैसी सुस्ती तो नहीं दिखलायी, लेकिन गिरे हुए मनोबल का असर वहां की सियासत में भी देखने को मिला। कायदे से कांग्रेस आलाकमान को वहां उसी दिन से कैम्प करना चाहिए था, लेकिन सबकुछ मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के भरोसे छोड़ दिया गया। अनुकूल राज्यपाल पाकर बीजेपी ने बाजी मार ली है और कांग्रेस ने मणिपुर में भी मौका गंवा दिया है। यहां भी बीजेपी का पूरा नेतृत्व नयी सरकार बनाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करता दिखा।

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