सैफुल्ला-सरताज के बहाने

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लखनऊ के ठाकुरगंज में मारे गये युवक का पिता सरताज गद्दार का पिता कहलाना नहीं चाहते। वह सैफुल्ला का पिता नहीं कहलाना चाहते। संदिग्ध आतंकी का पिता कहलाना उन्हें कबूल नहीं है। जो दाग लगा है उसे वो कबूलने को तैयार नहीं, मिटा देना चाहते हैं अभी इसी वक्त। इसलिए उन्हें वो लाश भी कबूल नहीं जिसके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उनकी थी। वो नहीं चाहते इस जिम्मेदारी को निभाना क्योंकि इसका अर्थ होगा वतन के साथ गद्दारी। ये सारी सोच एक पिता की है जो मजहब से मुसलमान है।

मगर, आज सरताज का अपना परिचय भी नहीं है। सभी उसे सैफुल्ला के पिता कहकर ही बुला रहे हैं। सॉरी, हमें भी कहना पड़ेगा कि सैफुल्ला के पिता ने आखिर क्या कहा- ”कोई गद्दार मेरा बेटा नहीं हो सकता है। सीधी सी बात है। अगर मुझे जरा सी भी भनक होती कि वो ऐसे काम में लगा है तो मैं खुद उसे पुलिस के हवाले कर देता। फिर पूरी दुनिया देखती कि कैसे एक पिता अपने ही बेटे को पुलिस के हवाले करता है। बीमारी को छुपाने की कोई जरूरत नहीं है। छुपाने पर वह लाइलाज हो जाती है। मेरे बेटे ने गलत काम किया है। मुझे इस बात का अफसोस है।”

अफसोस तो हर किसी को है सरताज साहब। आपके पड़ोसी को भी होगा, आपके मित्र, रिश्तेदारों को भी होगा। इस मुल्क के हर इंसान को होगा जो अपनी ही धरती पर आतंकी पैदा होते देख रहे हैं।

अफसोस इस बात का भी है कि आप देख नहीं पाए कि आपके ही छत के नीचे बागी विचार पल रहे थे। काश! सैफुल्ला की मां जिन्दा होती। वो सैफुल्ला को रोक सकती थी। वो आपको भी रोक सकती थी। सैफुल्ला ने गलती की, देश से दगा किया। पर, आपने क्यों गलती की? बाप-बेटे के रिश्ते को क्यों दगा दे रहे हैं?

सैफुल्ला साहब! ऐसी देशभक्ति भी क्या जो एक बाप को अपने ही बेटे के लिए मिट्टी देने से रोके। आपने तो देशभक्ति को भी शर्मिन्दा कर दिया।

अरे क्या होता लोग आपको भी गद्दार कहते। गद्दार सुनने के डर से ईमान की बात ही छोड़ दी? आप इस बात को क्यों भुला गये कि मौत के बाद तो इसी धरती पर भगवान राम ने रावण को भी प्रणाम किया था। बड़ी बहस छेड़ दी सैफुल्ला साहब! अब आपकी वजह से हमें भी सुनना पड़ेगा देशभक्ति का पाठ।

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