सहिष्णुता के पैरोकारों! तारिक फतह पर हमले की निन्दा तो करो, झूठा ही सही

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तारिक फतह पर हमले पर श्मशान सी खामोशी क्यों है? कब्रिस्तान और श्मशान की सियासत का बवाल यहां क्यों नहीं दिख रहा? कहां हैं दिग्विजय, कहां हैं बुद्धिजीवी साहित्यकार, सहिष्णुता के पैरोकार?

तारिक फतह का कसूर इतना ही है कि उन्होंने इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ बोलने का साहस दिखलाया है। तारिक का कसूर इतना ही रहा है कि उन्होंने बलूचिस्तान की आवाज़ को बुलन्द किया है, वहां पाकिस्तान के जुल्मों सितम को दुनिया के सामने बेपर्द किया है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि जश्ने रेख्ता महोत्सव में तारिक के खिलाफ जो नारेबाजी हुई, उन्हें हटाने की जिद पर जो हंगामा और तारिक के साथ मारपीट हुई- वो कौन लोग थे? क्यों नहीं उनके खिलाफ कार्रवाई हुई? पुलिस ने बलवाइयों के हाथों तारिक फतह को सुरक्षित निकाल लिया। क्या यही काफी था?

फतह ने हमलावरों को जिहादी बताया है। हमलावरों ने हमले के बाद धमकी भी दी है कि अगर मजहब के बारे में उल्टा-सीधा कहोगे तो अंजाम बुरा होगा। फतह ने एक कविता के माध्यम से जेहादियों को सीख दी है कि वे अपनी आत्मा को मुसलमान बनाएं देश को नहीं, वे अपने अहंकार पर तेजाब डाल दें, दिमाग पर नहीं।

महोत्सव के आयोजकों की सफाई भी काबिले गौर है। वो कहते हैं कि उन्होंने तारिक फतह को न्योता नहीं दिया था। वाह। क्या वहां पहुंचने वाले सारे लोगों को न्योता दिया गया था? जिन्हें न्योता नहीं दिया जाएगा, क्या उनके पहुंच जाने पर उनके साथ मारपीट की जाएगी? न्योता नहीं भी दिया गया होगा तो वे किसी मित्र के साथ वहां पहुंचे होंगे। क्या आयोजक की सफाई मात्र से उनके नपुंसकता छिप जाएगी? ऐसे कई सवाल हैं जो तारिक फतह पर हमले के बाद उठ रहे हैं।

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