विश्वासमत जीत गये, क्या विश्वास भी जीत सकेंगे पलानीसामी?

विश्वासमत जीत गये, क्या विश्वास भी जीत सकेंगे पलानीसामी?

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तमिलनाडु में मुख्यमंत्री इ पलानीसामी ने विश्वासमत तो जीत लिया, लेकिन विश्वास जीता या नहीं- ये सवाल अभी अनुत्तरित रहेगा। विपक्ष के वाकआऊट और पूर्व मुख्यमंत्री पनीर सेल्वम के विरोध के बीच इ पलानी सामी की सरकार ने 234 विधानसभा सदस्यों वाले सदन में 122 विधायकों का समर्थन साबित कर दिखाया। सरकार बचाने के लिए 117 विधायकों का समर्थन जरूरी था। 11 विधायकों ने विरोध में मतदान किया।

5 दिसंबर को जयललिता की मौत के बाद पनीर सेल्वम ने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला, जबकि शशिकला को पार्टी में महासचिव पद की जिम्मेदारी मिली थी। दो महीना बीतते ही 5 फरवरी को शशिकला विधायक दल की नेता भी बन गयीं और पनीर सेल्वम को इस्तीफा देना पड़ा।

तमिलनाडु में नयी सरकार बनने पर लोगों में खुशी भी है। राजनीतिक गतिरोध की स्थिति खत्म हो गयी, वहीं लोकतांत्रिक तरीके से ‘चुने’ गये नये नेता ने मुख्यमंत्री पद का भार ग्रहण किया। हालांकि खुशी उनलोगों में ज्यादा है जो शशिकला को मुख्यमंत्री के तौर पर देखना नहीं चाहते थे।

राज्यपाल के पास नहीं बचा था कोई और चारा
तमिलनाडु के राज्यपाल सी विद्यासागर राव ने व्यावहारिकता दिखलायी और उन्होंने आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतज़ार किया। हालांकि ऐसा करने की कोई संवैधानिक जरूरत नहीं थी। बावजूद इसके पूर्व मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम की धमकी में आकर इस्तीफा देने की बात और परिस्थितिजन्य हालात को परखते हुए उन्होंने शशिकला को शपथ दिलाने से बचने का रास्ता निकाला।

जब सही साबित हुआ था राज्यपाल का ‘अनिर्णय’
सुप्रीम कोर्ट से 4 साल की सज़ा पाने के बाद राज्यपाल का फैसला देशभर में सराहा गया। वहीं, शशिकला ने जेल जाते-जाते भी एक और पनीर सेल्वम तमिलनाडु की किस्मत में ठोंक गयीं। नया नाम इ पलानीसामी था। अबकी बार राज्यपाल विवश थे। उनके पास पलानीसामी को शपथ दिलाने के सिवा कोई चारा नहीं था।

द्रमुक ने पुरजोर विरोध किया, स्टालिन गिरफ्तार
हालांकि लोकतंत्र की हत्या की बात कहते हुए द्रमुक ने इस ताजपोशी का पुरजोर विरोध किया और सी-बीच पर भूख हड़ताल भी शुरू कर दी, लेकिन द्रमुक प्रमुख स्टालिन को समर्थकों समेत गिरफ्तार कर लिया गया।

पनीरसेल्वम को भी चाहिए ‘न्याय’
पनीर सेल्वम भी अपने खिलाफ कथित अत्याचार और कथित लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या का दंभ भरते हुए विरोध पर उतारू हैं। पर, उन्हें कोई बड़ा समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है। वजह साफ है कि जो व्यक्ति किसी के कहने पर मुख्यमंत्री बनता हो, किसी के दबाव में इस्तीफा देता हो और हर वक्त गुहार लगाने की मुद्रा में हो, ऐसे व्यक्ति को समर्थन देने का खतरा कौन मोल ले?

जयललिता के नक्शेकदम पर शशिकला?
शशिकला ने ठीक उसी तरह ई पलानीसामी को मुख्यमंत्री की बागडोर सौंपी है जिस तरह जयललिता ने ई पनीरसेल्वम को सत्ता की बागडोर समय-समय पर सौंपी थी। इरादा साफ है। तमिलनाडु को एक और कठपुतली मुख्यमंत्री मिल चुका है।

आश्चर्य होता है कि जो तमिलनाडु जलीकट्टू के लिए सी-बीच पर लगातार विरोध प्रदर्शन से केंद्र और राज्य सरकार को हिला सकता है, वही तमिलनाडु कठपुतली मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं बुलंद कर रहा है? द्रमुक लगातार तमिलनाडु को इसी मसले पर झकझोर रहा है, लेकिन उसका अपना अतीत कितनी दूर तक जनता को झकझोर पाएगा- इस पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

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